Wednesday, September 22, 2010

हम बालक प्रेहरी हैं..............


हम बालक प्रेहरी हैं अपनी पुरखों की जागीर के ,
देश भक्ति है इस सीने में देख लो चाहे चीर के ।

हमें झुका सकता है कोई अपने सच्चे प्यार से ,
नहीं झुका सकता है कोई हमको अत्याचार से ।
इससे कहदो उससे कहदो कहदो पाकिस्तान से ,
भारत वाले दुनिया में जियेंगे निज सम्मान से ।
चारो तरफ लगादेंगे पहरे अपनी कश्मीर के............
देश भक्ति है इस सीने में देख लो चाहे चीर के ..........

कौन हिमालय की चोटी पे देखो हाथ लगाएगा ,
किसने माँ का दूध पिया जो सोते शेर जगाये गा ।
भारत भूमि पर होंगे हर सपने मटिया मेट तेरे ,
कश्मीर की धरती पर तड़पेंगे मिसाइल और जेट तेरे ।
प्यार दिया है अपना बदलेमे तेरी शमशीर के .............
देश भक्ति है इस सीने में देख लो चाहे चीर के ..............

कौन कहे गा दुनिया में कश्मीर की घाटी तेरी है ,
जिस धरती के कण कण में नेहरू की राख़ बिखेरी है ।
कितनी बहनों के माथे का सिंदूर गँवा के पाया है ,
लालबहादुर जैसे लाखों लाल गँवाके पाया है ।
हमने ये सब खेल दिखाए तोप तमंचे तीर से ........
देश भक्ति है इस सीने में देख लो चाहे चीर के ..............

Tuesday, September 21, 2010

अपने वतन की बेटी

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मै अपने वतन की बेटी हू,भारत की राज दुलारी हूँ ,
माना की घरमें अबला हूँ पर रण की मै चिंगारी हूँ .

भाई बन कर कोई आये तो उसको मै शीश झुका ती हूँ ,
दुश्मन बन आंख दिखाए तो पल भर मै मोल चुकती हूँ .
दुर्गा बन कर इस धरती पर मैने तलवार उठाई है ,
मीणा बाज़ार के महलों में अकबर की आंख झुकाई है .
में लक्ष्मी हू इस मट्टी की राणा की तेज दुधारी हूँ .
माना के घर में अबला हूँ ................................

मेरी नस नस में गौरव है अभिमान है मेरे सीने में ,
संकट के दिन में घर बैठू धिक्कार है ऐसे जीने में .
सीमा के प्रहरी सावधान अपना मत शीश झुका देना ,
गर वक़्त पड़े तो भारत की मिट्टी का मोल चुका देना .
तुम भाई हो मेरे प्यारे मै बहिन तुम्हारी प्यारी हूँ .
माना की घर में अबला हूँ ...............................

Monday, September 20, 2010

इतिहास परीक्षा थी ...................उस दिन .


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इतिहास परीक्षा थी उस दिन चिंता से ह्रदय धड़कता था ,
थे शगुन बुरे घर से चलते वक़्त दाया नयन फड़कता था।

जितने प्रशन मैंने याद किये उनमेसे आधे याद हुए ,
आधे में से बचे हुए    स्कूल जाते जाते बर्बाद हुए ।
तुम बीस मिनट हो लेट गेट पर द्वारपाल चिल्लाई ,
मै मेल ट्रेन की तरह दौड़ कर कक्षा के भीतर आई ।

पेपर हाथो मे थाम लिया आंखे मूंदी मन झूम गया ,
पढ़ते ही छाया अन्धकार चक्कर आया सर घूम गया ।
था सौ नम्बर का पेपर मुझको २ की भी आस नहीं ,
चाहे सारी दुनिया उलटे मै हो सकती थी पास नहीं ।

प्रश्नपत्र  देने  वालो क्या मुह लेकर दे उत्तर हम ,
जोचाहे  लिखदूँ  मेरी मर्जी ये पेपर है या एटम बम्ब .
फिर आँख मूँद के बैठ गयी बोली भगवन द्याकरो ,
इनसब प्रश्नों के उत्तर मेरे दिमाक मे जल्दी भरदो।

द्रोपदी समझ के अब मेरा भी चीर बढाओ तुम ,
मै विष खा के मर जाऊँगी जो जल्दी ना आये तुम ।
आकाश फटा और अम्बर से  आई  आवाज तभी ,
मुर्ख व्यर्थ क्यों रोती है जरा आंख उठा के देख यही ।

गीता कहती है कर्म करो फल की चिंता मत किया करो ,
जो कुछ भी याद रहा है वो पेपर मे बस लिख दिया करो ।
मेरे अंतर मनके द्वार खुले पेपर पे यूँ चली कलम चंचल ,
जिस तरह चलता है बंजर धरती पर किसान का हल ।

लिखदिया पानीपत का दूसरा युद्ध हुआ था सावन में ,
 जापान जर्मनी युद्ध हुआ था अठारासौ सत्तावन में ।
लिखा दिया महात्मा बुद्ध अपने गाँधी जी के चेले थे ,
बचपन मे वो गाँधी के संग आंख मिचौली खेले थे ।

हुमायूँ का बेटा था अकबर और उसका पोता था बाबर ,
गुप्त वंश मे राज किया था रज़िया बेगम ने भारत पर ।
तैमूर लंग रोज उठते ही दो घंटे नाच  नाचता था
औरंगजेब रंग मे आकार औरों की जेब काटता था ।

लिखा दिया मोहम्मद गौरी ने राणा को रण मे हराया था ,
अमरीका से हिंदमहासागर ट्रांसपोर्ट कर के मँगवाया था।

इस तरह अनोखे भावों के फूटे अन्दर से फव्वारे ,
जो जो सवाल पूछे नहीं उनके भी उत्तर दे डाले ।
हो गए परीक्षक पागल से मेरे उत्तरों को देख देख ,
बोले इन सारे बच्चों मे बस होनहार है यही एक ।

बाकी सब पेपर फेंक दिए मेरे सब उत्तर छाँट लिए ,
जीरो नम्बर दे के बाकी सारे नम्बर काट लिए ।

Monday, February 2, 2009